सच्चे देव True God

 

आप्तेनोच्छिन्नदोषेण सर्वेज्ञेनागमेशिना।
भवितव्यं नियोगेन नान्यथा ह्याप्तता भवेत्॥५॥ RKS

 

हितउपदेशी, दोष ना, सर्वज्ञ व वीतराग।
देवपना हो नियम से, केवली के न राग॥५॥

 

आप्त को अठारह दोषों से रहित वीतराग, सर्वज्ञ और आगम का हितोपदेशी नियम से होना चाहिये क्योंकि अन्य प्रकार से देवपना नहीं हो सकता।

 

The true god as a rule should be free from eighteen faults and passionless, omniscient and deliverer of sermons.

 

क्षुत्पिपासाजरातङ्कजन्मान्तकभयस्मया:।
न रागद्वेषमोहाश्च, यस्याप्त: स प्रकीर्त्यते॥६॥ RKS

 

भूख, प्यास, रोग न जरा, जन्म, मरण, भय न राग।
गर्व, राग, द्वेष, मोह ना, अरति न चिन्ता आग॥
निद्रा, और आश्चर्य नहीं, स्वेद, रोष ना खेद।
जिन अठारह दोष नहीं, आगम का यह वेद॥६॥

 

सच्चे देव १८ दोषों से रहित होते है। भूख, प्यास, बुढ़ापा, रोग, जन्म, मरण, भय, गर्व, राग, द्वेष, मोह, चिन्ता, अरति, निद्रा, आश्चर्य, स्वेद, रोष और खेद।

 

The god is free from 18 flaws. Hunger, thirst, old age, disease, birth, death, fear, pride, attachment, aversion, infatuation, worry, disliking, sleep, surprise, hatred, fury, sorrow.

 

परमेष्ठी परंज्योतिर्विरागो विमल: कृती।
सर्वज्ञोऽनादिमध्यान्त:, सार्व: शास्तोपलाल्यते॥७॥ RKS

 

परम पद व ज्योति परम, मलरहित, केवल ज्ञान।
आदि मध्य और अंत रहित, हित उपदेशक जान॥७॥

 

आप्त ही है- परमेष्ठी- परम पद में स्थित, परम ज्योति- केवलज्ञानी, रागरहित, मलरहित, कृतकृत्य, सर्वज्ञ, आदि-मध्य-अंत रहित, सर्वहितकर्ता, और हितोपदेशक।

 

True God is, highest status, omniscient, free from all kind of desires, pure, devoid of beginnings, end and middle, friend of all living beings and a teacher.

 

अनात्मार्थं विना रागै:, शास्ता शास्ति सतो हितम् ।
ध्वनन् शिल्पिकरस्पर्शान्मुरज: किमपेक्षते॥८॥ RKS

 

प्रयोजन व आस नहीं, हित उपदेश हो ख़ास।
ज्यूँ संगीतज्ञ हाथ लगे, ठोल बजे बिन आस॥८॥

 

हितोपदेशक बिना अभिलाषा के अपना प्रयोजन न होने पर भी भव्यजीवों के हित को कहते हैं जैसे मृदंग संगीतज्ञ के हाथ लगाने पर बिना किसी अपेक्षा बज उठता है।

 

Just as drum gives sound without any expectation in consequence of the contact of drummers hand, so does the teacher reveals truth without any expectation.