सम्यग्दर्शन के लाभ Benefits of Right Faith

 

ओजस्तेजो विद्यावीर्ययशोवृद्धिविजयविभवसनाथा:।
महाकुला महार्था मानवतिलका भवन्ति दर्शनपूता:॥३६॥RKS

 

ओज, तेज, विद्या, वीर्य, यश, मनु सम्यग्दृष्टि महान।
विजय, वैभव, कुल, उन्नति, पुरुषार्थ की शान॥१.३६॥

 

सम्यग्दृष्टि मनुष्य गति जीव उत्साह, तेज, विद्या, वीर्य, यश, वृद्धि, विजय और वैभव से युक्त महान कुल में जन्म, पुरुषार्थी व मनुष्यों में उत्तम होते है।

 

Those with right faith become the Lords of splendour, energy, wisdom, progress, fame, wealth, victory and greatness. They are born in high families and possess the ability to realise the highest dharma, Artha Kama and moksha of life and they are the best of humans.

 

अष्टगुणपुष्टितुष्टा दृष्टिविशिष्टा प्रकृष्टशोभाजुष्टा:।
अमराप्सरसां परिषदि चिरं रमन्ते जिनेन्द्रभक्ता: स्वर्गे ॥३७॥RKS

 

शोभा युक्त व आठ ऋद्धि, सम्यग्दृष्टि संयोग।
अप्सरा की सभा मिले, चिरकाल करे भोग॥१.३७॥

 

सम्यग्दर्शन से युक्त जिनेन्द्र भक्त देव अणिमा महिमा आदि आठ ऋद्धि से पूर्ण, प्रमुदित व उत्कृष्ट शोभा से संयुक्त होकर देवों और अप्सरा की सभाओं में चिरकालिक तक आनन्द का उपभोग करते है।

 

Those who have the right faith are born as celestial beings where they become the devotees of Lord Jinendra and endowed with eight kinds of miraculous powers and great splendour, enjoy themselves for long millenniums in the company of Devas and devanganas.

 

नवनिधिसप्तद्वयरत्नाधीशा: सर्वभूमिपतयश्चक्रम।
वर्तयितुं प्रभवन्ति स्पष्टदृश: क्षत्रमौलिश्खरचरणा:॥३८॥RKS

 

नौ निधि चौदह रत्न हो, चक्रवती संयोग।
सम्यग्दृष्टि राज करे, मुकुट चरण का योग॥१.३८॥

 

निर्मल सम्यग्दृष्टि जीव नौ निधि व चौदह रत्न का स्वामी और सर्वभूमि के अधिपति होकर सुदर्शन चक्र को चलाने में समर्थ होते है। नमस्कार करते हुए राजाओं की मुकुटों की माला से उनके चरण व्याप्त रहते है।

 

Those who are endowed with the right faith are attended upon by great emperors and kings, they acquire all the most wonderful things in the world, the entire earth comes under their sway and they are competent to command all men.

 

अमरासुरनरपतिभिर्यमधरपतिभिश्च नूतपादाम्भोजा:।
दृष्ट्या सुनिशचितार्था वृषचक्रधरा भवन्ति लोकशरण्या:॥३९॥RKS

 

अमर, असुर, यम व नर पति, तत्त्व व दर्शन ज्ञान।
धर्मचक्र धारण करे, लोक शरण ले जान॥१.३९॥

 

सम्यग्दर्शन द्वारा जिन्होंने तत्त्वार्थ भलिभाँति समझा है वे अमरपति, असुरपति, नरपति व यमधरपति से चरणकमल पूजे जाते हैं जो लोक को शरण देने के योग्य है ऐसे धर्मचक्र के धारक तीर्थंकर होते है।

 

By virtue of right faith man acquire the supreme status of Tirthankara, the master who knows all things well, whose feet are worshipped by the rulers of Devas, Lord of Asuras and Kings of man, as well as by holy saints, who is the support of dharma and the protector of all living beings in the three worlds.

 

शिवमजरमरुजमक्षयमव्याबाधं विशोकभयशङ्कम्।
काष्ठागतसुखविद्याविभवं विमलं भवन्ति दर्शनचरणा:॥४०॥RKS

 

जर जरा व बाधा रहित, भय शोक नहीं भाव।
सुख विद्या शंका रहित, निर्मल मोक्ष की छाँव॥१.४०॥

 

सम्यग्द्रष्टि जीव अजर, अरुज, अक्षय, अव्याबाध, शोक, भय, शंकारहित चरमसीमा को प्राप्त सुख और ज्ञान के वैभव वाले निर्मल शिव मोक्ष को प्राप्त होते है।

 

Those who take refuse in right faith attain to the supreme seat, which is free from old age, disease, destruction, decrease, grief, fear and doubt and implies unqualified perfection in respect of wisdom and bliss and freedom from all kinds of impurities of karma.

 

देवेन्द्रचक्रमहिमानममेयमानं राजेन्द्रचक्रमवनीन्द्रशिरोऽर्चनीयम्।
धर्मेन्द्रचक्रमधरीकृतसर्वलोकं लब्धवा शिवं च जिनभक्तिरुपैति भव्य:॥४१॥RKS

 

देवेन्द्र व राजेन्द्र चक्र भी, धर्मेन्द्र चक्र का योग।
तीर्थंकर का पद मिले, सम्यग्दृष्टि संयोग॥१.४१॥

 

इस प्रकार जिनेंद्र देव की भक्ति करने वाला सम्यक दृष्टि भव्य जीव अपरिमित प्रमाण वाली देवेन्द्र समूह की महिमा को पाकर मुकुट बद्ध राजाओं के मस्तक से अर्चनीय राजेंद्र चक्र चक्रवती के पद को पाकर पर्व और लोक को अपना उपासक बनाने वाले धर्मेन्द्रचक्र रुप तीर्थंकर पद को पाकर अंत में शिवपद को प्राप्त होता है।

 

The bar via Jeeva who follows the JinendraDev acquires the immeasurable glory of deva life and position of Chakravarty, before whom Kings and rulers of man prostrate themselves and attain to the supremely worshipful status of Godhood finally also reaches Nirvana.