परोक्ष Indirect Knowledge

मति Sensory Knowledge
श्रुत Scriptural Knowledge

 

आद्ये परोक्षम्॥१.११॥TS

 

मति श्रुत दोनों को समझ, आदि के दो ज्ञान।
है परोक्ष प्रमाण कहा, ‘पर’ पर निर्भर जान॥१.११॥

 

प्रारम्भ के दो (मति व श्रुत) परोक्ष प्रमाण है।

 

The first two kind of knowledge (sensory and scriptural) are indirect knowledge.

 

अक्खस्स पोग्गलकया, जं दव्विन्दिय-मणा-परा तेणं।
तेहिं तो जं नाणं, परोक्खमिह तम -णुमाणं व।।१४।।SSu

 

भिन्न मन द्रव्येन्द्रियाँ, जीव अलग पहचान।
कहे ज्ञान परोक्ष  उसे , ‘पर’ करता अनुमान॥४.३८.१४.६८७॥

 

पौद्गलिक होने के कारण द्रवेन्द्रिया और मन जीव (अक्ष) से पर है। अत: उससे होने वाला ज्ञान परोक्ष है। जैसे अनुमान मे धुएँ से अग्नि का ज्ञान होना।

 

The objective senses (Dravyendriya’s) and the mind (mana) are different from “Aksha” (Jiva). Hence the knowledge acquired thorough them is called indirect (paroksa). Just as in inference (Anuman) the smoke gives the knowledge of fire in the same way the indirect knowledge is caused by non self (par/other). (687)

 

होंति परोक्खाइं मइ-सुयाइं जीवस्स पर-निमित्ताओ।
पुव्वो-वलद्ध-संबंध-सरणाओ, वाणुमाणं व।।१५।।SSu

 

मति व शब्द परोक्ष है, ‘पर’ निमित्त है ज्ञान।
पूर्व है और याद से, पर निमित्त अनुमान॥४.३८.१५.६८८॥

 

जीव के मति और श्रुतज्ञान परनिमित्तक होने के कारण परोक्ष है। अथवा अनुमान की तरह पहले से उपलब्ध अर्थ के स्मरण द्वारा होने के कारण भी वे परनिमित्तक है।

 

The sensory and scriptural knowledge of the soul (jiva) are indirect (Apratyaksha) by virtue of being dependent upon others because they are caused by the remembrance of an object known before (but which is now out of sight), as in inference. (688)