उपगूहन Protection

 

णो छादए णोऽवि य लूसएज्जा, माणं ण सेवेज्ज पगासणं च।
ण या वि पण्णे परिहास कुन्जा, ण याऽऽ सियावाद वियागरेज्झा।।२१।।SSU

 

ना ढके ना कहे ग़लत, चाहे नहीं प्रचार।
ज्ञानी की निंदा नहीं, ना वरदान विचार॥२.१८.२१.२३९॥

 

न शास्त्र के अर्थ को छिपाये और नही शास्त्र की असम्यक् व्याख्या करे। न मान करे न अपने बड़प्पन का प्रदर्शन करे। न किसी विद्वान का परिहार करे न किसी को आशीर्वाद दे।

 

The wise man should not conceal the meaning of a scriptural text nor should he distort it; he should not harbour pride or a tendency to self-display; he should not make fun of anyone or bestow words of blessing on anyone. (239)

 

 

स्वयं शुद्धस्य मार्गस्य, बालाशक्तजनाश्रयाम।
वाच्यतां यत्प्रमार्जन्ति, तद्वदन्त्युपगूहनं॥१५॥ RKS

 

रत्नत्रय पथ निर्मल है, दोष हो जब अज्ञान।
सम्यग्दृष्टि प्रकट न करे, उपगूहन यह जान॥१५॥

 

रत्नत्रयरूप मोक्ष मार्ग स्वभाव से निर्मल है लेकिन अज्ञानी द्वारा उसमें कोई दोष उत्पन्न होता है तो सम्यग्दृष्टि जीव उस दोष को छुपाकर उपगूहन अंग को दृढ़ करते है।

 

To hide the ridicule raised by ignorant about path of Jainism is upguhun anga.