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ऋजुसुत्रनय Straight View

 

जो एयसमयवट्टी, गिह्णइ दव्वे धुवत्तपज्जायं।
सो रिउसुत्तो सुहुमो, सव्वं पि सद्दं जहा खणियं ॥17॥SSu

 

यः एकसमयवर्तिनं, गुह्णाति द्रव्ये ध्रु वत्वपर्यायम्।
स ॠजुसूत्रः सूक्ष्मः, सर्वोऽपि शब्दः यथा क्षणिकः ॥17॥

 

वर्तमान ही ग्रहण करे, हर पल होता नाश ।
सूक्ष्मॠजुसूत्र नय यही, क्षण ही सबका वास ॥4.39.17.706॥

 

जो द्रव्य में एकसमयवर्ती (वर्तमान) अधु्रव पर्याय को ग्रहण करता है उसे सूक्ष्मॠजुसूत्रनय कहते हैं। जैसे सब सत्क्षणिक है।

 

The fine-Riju-sutranaya (Sukshma – Rijasutra – naya) explains the actual unstable (Adhurva) condition of a substance at a particular instant for example all the words are transient (Kshanik/momentary/fleeting). The naya which grasps the evanescent modes of an enternal substance, is called Rjusutra naya, for example `to say that’ all the sound is momentary’. (706)

 

मणुवाइ-पज्जाओ, मणुसो त्ति सभाट्ठिदीसु वट्टंतो।
जो भणइ तावकालं, सो थूलो हाइ रिउसुत्तो ॥18॥SSu

 

मनुजादिकपर्यायो, मनुष्य इति स्वकस्त्त्तिषफ वर्तमानः ।
यः भणति तावत्कालं, स स्थूलो भवति ॠजुसूत्रः ॥18॥

 

मनुष्यादि पर्याय समय, वर्तमान का भान ।
ग्रहण काल को ही करे, सूत्र स्थूलॠजु मान॥4.39.28.707॥

 

और जो अपनी स्थितिपर्यन्त रहने वाली मनुष्यादि पर्याय को उतने समय तक एक मनुष्यरूप से ग्रहण करता है वह स्थूल-ॠजुसूत्रनय है।

 

The Gross Riju sutra naya deals with the actual condition of a substance for a long time such as a man in human mode (Manushya-paryaya). On the other hand that naya which attritubes a mode like man-ness etc. to a being, throughout the course of that period during which this being continues to exhibit that mode is the sub-type of Rjusutranaya, called Sthularjusutranaya. (707)