परिग्रह परिमाणाणुव्रत के अतिचार Violation of Limiting Possession Vow

 

क्षेत्रवास्तुहिरण्यसुवर्णधनधान्यदासीदासकुप्यप्रमाणातिक्रमा:॥२९॥TS

 

भूमि मकान रजत सुवर्ण, धन अन्न पशु दास ।
वस्त्र बर्तन सीमा भंग हो, परिग्रह व्रत का ह्वास॥७.२९.२६५॥

 

परिग्रहपरिमाण व्रत के पाँच अतिचार:

१। क्षेत्र – वास्तु

२। चांदी सोना

३। धन धान्य

४। दासी दास

५। वस्त्र बर्तन आदि।

 

Five violations of limits set for non-possession vow:

  • Land and houses
  • Gold and silver
  • Money and crops
  • Men and women servants
  • Clothes and utensils

 

भाविज्ज य संतोसं, गहिय-मियाणिं अजाणमाणेणं।
थोवं पुणो न एवं, गिह्ल्स्सिामो त्ति (न) चिंतिज्जा।।१७।।SSu

 

सदा भाव संतोष  रहे, सीमा में सामान।
पुन:ग्रहण का भाव नहीं, अपरिग्रह का भान॥२.२३.१७.३१७॥

 

उसे संतोष रखना चाहिये। उसे एेसा विचार नही करना चाहिये की अभी तो सीमा मे परिग्रह करता हूँ बाद मे अधिक ग्रहण कर लूँगा।

 

  1. He should be contented. He should not think “I have fixed certain limits this time unknowingly; in future, I’ll again accept that in case of need.” (317)